दिल-पाकीज़ा

दिल-पाकीज़ा… कुछ खास नहीं… बस एक प्रयास है, अपने विचारों को व्यक्त करने का… अपनी अनुभूतियों को सन्जो के रखने का
ज़िन्दगी के हर आयाम को समझना शौक है मेरा.. कोई मंज़िल नहीं है, पर सफ़र जारी रहता है.. सीखने का.. सीखते रहने का..
शब्दों की बारिश में भीगना पसंद है मुझे… सूरजमुखी सा खिलना पसंद है मुझे.. अँधेरे में सितारों को ताकना भी भाता है.. चलना भी जानती हूँ.. ठहरना भी पसंद है मुझे।
दिल की ज़मीन पर कुछ ख्वाबों के बीज बिखरे हैं.. रोज़ आशा की किरन पड़ती है जिनपे.. कुछ कोंपले फूट पड़ी है, तो कुछ पौधे मुरझा गए है.. हर एक रंग का फूल है इस बगिया में.. मगर संभल कर.. कुछ कांटे भी बिखरे पड़े है.. बस इतना सा सार है मेरी कलम का.. दिल से लिखती हूँ.. दिल को पढ़ाना चाहती हूँ..

मोजज़ा हो कोई तो फिर क़फ़स से छूटें ‘पाकीज़ा’।
सिर्फ पैकर बदल लेने से आज़ादी नहीं मिला करती।।